📿 श्लोक संग्रह

मय्यावेश्य मनो ये माम्

गीता 12.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेताः ते मे युक्ततमा मताः ॥
मयि
मुझमें
आवेश्य
लगाकर, स्थिर करके
मनः
मन को
ये
जो
माम्
मेरी
नित्ययुक्ताः
सदा जुड़े हुए, लगे हुए
उपासते
उपासना करते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
परया
परम, सबसे उत्तम
उपेताः
युक्त, सम्पन्न
ते
वे
मे
मेरे मत में
युक्ततमाः
सबसे श्रेष्ठ योगी
मताः
माने जाते हैं

अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण स्पष्ट कहते हैं — जो भक्त अपना मन मुझमें लगाकर, निरंतर जुड़े रहकर, सबसे उत्तम श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं, वे मेरी दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

तीन बातें यहाँ खास हैं — मन मुझमें लगाना, निरंतर जुड़े रहना, और परम श्रद्धा। जैसे एक बच्चा खेल में पूरी तरह डूब जाता है — उसका मन कहीं और नहीं जाता। वैसे ही भक्त का मन कृष्ण में पूरी तरह डूब जाता है।

यह श्लोक कृष्ण का सीधा उत्तर है। सगुण भक्ति — यानी प्रेम, श्रद्धा और लगाव से की गई उपासना — कृष्ण को सबसे प्रिय है।

यह श्लोक अर्जुन के प्रश्न (12.1) का तत्काल उत्तर है। कृष्ण ने पहले सगुण भक्त की प्रशंसा की, फिर 12.3-4 में निर्गुण उपासकों को भी मान्यता दी। इस क्रम से स्पष्ट होता है कि कृष्ण दोनों मार्गों को स्वीकार करते हैं, परंतु सगुण भक्ति को युक्ततम बताते हैं।

परंपरा में इस श्लोक को भक्तियोग का मूल सूत्र माना जाता रहा है। 'युक्ततम' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है — इसका अर्थ है सबसे अच्छी तरह जुड़ा हुआ। यह शब्द 12.7 में भी आता है।

अध्याय 12 · 2 / 20
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