अभ्यास योग की पहली और सबसे उत्तम सीढ़ी यहाँ है। कृष्ण सीधे कहते हैं — अपना मन मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि मुझमें प्रवेश कराओ। बस इतना करो। फिर आगे के जीवन में तुम मुझमें ही निवास करोगे — इसमें कोई संशय नहीं।
यह सबसे सरल और सबसे ऊँची बात एक साथ है। जैसे एक पोता जब दादा का हाथ थाम लेता है, तो रास्ते की चिंता नहीं रहती — वैसे ही जो मन कृष्ण में लग जाता है, उसे और कोई खोज नहीं करनी पड़ती।