📿 श्लोक संग्रह

मय्येव मन आधत्स्व

गीता 12.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
मयि एव
मुझमें ही
मनः
मन को
आधत्स्व
लगाओ, स्थिर करो
मयि
मुझमें
बुद्धिम्
बुद्धि को
निवेशय
लगाओ, प्रवेश कराओ
निवसिष्यसि
निवास करोगे, रहोगे
मयि एव
मुझमें ही
अतः ऊर्ध्वम्
इसके बाद, आगे
न संशयः
कोई संदेह नहीं

अभ्यास योग की पहली और सबसे उत्तम सीढ़ी यहाँ है। कृष्ण सीधे कहते हैं — अपना मन मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि मुझमें प्रवेश कराओ। बस इतना करो। फिर आगे के जीवन में तुम मुझमें ही निवास करोगे — इसमें कोई संशय नहीं।

यह सबसे सरल और सबसे ऊँची बात एक साथ है। जैसे एक पोता जब दादा का हाथ थाम लेता है, तो रास्ते की चिंता नहीं रहती — वैसे ही जो मन कृष्ण में लग जाता है, उसे और कोई खोज नहीं करनी पड़ती।

यह श्लोक 12.8 से 12.12 तक के 'अभ्यास-योग सोपान' की पहली सीढ़ी है। कृष्ण यहाँ सबसे ऊँचा स्तर बताते हैं — मन और बुद्धि दोनों मुझमें लगाओ। यदि यह न हो सके, तो 12.9 में अगला विकल्प आता है।

परंपरा में 12.8-12 को 'अभ्यास-योग की सीढ़ी' के रूप में जाना जाता रहा है — यह क्रमिक मार्ग है जो हर स्तर के साधक के लिए द्वार खोलता है।

अध्याय 12 · 8 / 20
अध्याय 12 · 8 / 20 अगला →