📿 श्लोक संग्रह

अथ चित्तं समाधातुम्

गीता 12.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
अथ
यदि, किंतु
चित्तम्
मन को, चित्त को
समाधातुम्
स्थिर करने में
न शक्नोषि
समर्थ नहीं हो
मयि
मुझमें
स्थिरम्
स्थिर
अभ्यासयोगेन
अभ्यास योग के द्वारा
ततः
तब
माम्
मुझे
इच्छा
इच्छा से, प्रयास से
आप्तुम्
पाने के लिए
धनञ्जय
हे अर्जुन, धन को जीतने वाले

कृष्ण जानते हैं कि हर कोई पहले ही प्रयास में मन को स्थिर नहीं कर सकता। इसलिए दूसरी सीढ़ी देते हैं — यदि मन मुझमें स्थिर नहीं होता, तो अभ्यास योग से प्रयास करो। बार-बार लगाओ, बार-बार लौटाओ — यही अभ्यास है।

जैसे एक बच्चा साइकिल चलाना सीखता है — पहले गिरता है, फिर उठता है, फिर कोशिश करता है। धीरे-धीरे संतुलन आ जाता है। वैसे ही मन को बार-बार कृष्ण की ओर लौटाना — यही अभ्यास योग है।

यह अभ्यास-योग सोपान की दूसरी सीढ़ी है। 12.8 में पहली — मन और बुद्धि सीधे मुझमें लगाओ। 12.9 में दूसरी — यदि वह न हो सके तो अभ्यास से प्रयास करो। 12.10 में तीसरी सीढ़ी आएगी।

परंपरा में 'अभ्यासयोग' शब्द बहुत महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। गीता के छठे अध्याय (6.35) में भी कृष्ण ने 'अभ्यासेन तु कौन्तेय' कहकर अभ्यास की महत्ता बताई है।

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