यहाँ कृष्ण उन साधकों की बात करते हैं जो निराकार, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं। यह ब्रह्म शब्दों में नहीं आता, आँखों से नहीं दिखता, सोच से परे है — फिर भी सब जगह व्याप्त है, सदा अटल है।
जैसे हवा दिखती नहीं पर हर जगह है — वैसे ही यह निराकार ब्रह्म अदृश्य होते हुए भी सब में समाया है। जो साधक इस भाव से उपासना करते हैं, वे भी कृष्ण को ही पाते हैं।