📿 श्लोक संग्रह

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्

गीता 12.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
ये तु
और जो
अक्षरम्
अविनाशी ब्रह्म को
अनिर्देश्यम्
जिसे शब्दों से नहीं बताया जा सकता
अव्यक्तम्
निराकार, जो दिखता नहीं
पर्युपासते
सब ओर से उपासना करते हैं
सर्वत्रगम्
सब जगह व्याप्त
अचिन्त्यम्
जिसे सोचा न जा सके
और
कूटस्थम्
अटल, सबके ऊपर स्थित
अचलम्
न हिलने वाला
ध्रुवम्
निश्चित, स्थिर

यहाँ कृष्ण उन साधकों की बात करते हैं जो निराकार, अव्यक्त ब्रह्म की उपासना करते हैं। यह ब्रह्म शब्दों में नहीं आता, आँखों से नहीं दिखता, सोच से परे है — फिर भी सब जगह व्याप्त है, सदा अटल है।

जैसे हवा दिखती नहीं पर हर जगह है — वैसे ही यह निराकार ब्रह्म अदृश्य होते हुए भी सब में समाया है। जो साधक इस भाव से उपासना करते हैं, वे भी कृष्ण को ही पाते हैं।

यह श्लोक 12.3-4 के जोड़े का पहला हिस्सा है। 12.2 में कृष्ण ने सगुण भक्त की प्रशंसा की, अब 12.3-4 में वे निर्गुण उपासकों को भी मान्यता देते हैं। दोनों श्लोक मिलकर एक पूरा विचार बनाते हैं — निर्गुण उपासक भी उन्हें पाते हैं, बस मार्ग अलग है।

परंपरा में इन श्लोकों को निर्गुण उपासना की मान्यता के रूप में देखा जाता रहा है। 12.5 में कृष्ण इस मार्ग की कठिनाई भी बताएँगे।

अध्याय 12 · 3 / 20
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