📿 श्लोक संग्रह

समः शत्रौ च मित्रे च

गीता 12.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
समः
समान, बराबर भाव वाला
शत्रौ च मित्रे च
शत्रु में और मित्र में
तथा
उसी तरह
मानापमानयोः
मान और अपमान में
शीतोष्णसुखदुःखेषु
सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में
समः
समान
सङ्गविवर्जितः
आसक्ति से रहित

यह श्लोक 12.18-19 के जोड़े का पहला हिस्सा है। यहाँ कृष्ण उस भक्त के बाहरी समभाव का वर्णन करते हैं। शत्रु हो या मित्र — समान। मान मिले या अपमान — समान। सर्दी हो या गर्मी, सुख हो या दुःख — सब में समान। और आसक्ति से रहित।

यह पत्थर की तरह निर्भावुकता नहीं है। यह एक दादा की परिपक्वता है जो जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देख चुके हैं और अब किसी भी परिस्थिति में डोलते नहीं।

यह भक्त-लक्षण श्रृंखला का छठा श्लोक है और 12.18-19 का पहला भाग है। इस जोड़े में कृष्ण के प्रिय भक्त के और गुण हैं — समभाव, स्तुति-निंदा में तटस्थता, मौन, संतोष, और गृह-रहितता।

परंपरा में इन दोनों श्लोकों को मिलाकर पढ़ा जाता रहा है क्योंकि दोनों मिलकर एक पूरा चित्र देते हैं।

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