यहाँ पाँच गुण बताए गए हैं। अनपेक्ष — किसी से कुछ माँगना नहीं। शुचि — मन और वाणी में शुद्धता। दक्ष — जो करना है, उसे कुशलता से करना। उदासीन — किसी पक्ष में न झुकना। गतव्यथ — अंदर से व्याकुलता खत्म।
और एक और — सर्वारम्भ-परित्यागी। यानी नए-नए उद्यमों, नई-नई योजनाओं में न उलझना। जैसे एक पकी उम्र के बुज़ुर्ग जो शांत होकर बैठते हैं — न कोई नई महत्वाकांक्षा, न कोई चिंता। बस शांत, स्थिर। ऐसा भक्त कृष्ण को प्रिय है।