📿 श्लोक संग्रह

श्रेयो हि ज्ञानम्

गीता 12.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥
श्रेयः
श्रेष्ठ है, बेहतर है
हि
निश्चित रूप से
ज्ञानम्
ज्ञान
अभ्यासात्
अभ्यास से
ज्ञानात्
ज्ञान से
ध्यानम्
ध्यान
विशिष्यते
विशेष है, उत्तम है
ध्यानात्
ध्यान से
कर्मफलत्यागः
कर्म के फल का त्याग
त्यागात्
त्याग से
शान्तिः
शांति
अनन्तरम्
तुरंत, सीधे

यह श्लोक एक सुंदर क्रम बताता है। अभ्यास से ज्ञान अच्छा है। ज्ञान से ध्यान विशेष है। ध्यान से कर्म-फल-त्याग उत्तम है। और त्याग से — सीधे शांति आती है, कोई देर नहीं।

यह जैसे एक सीढ़ी है। पर हर सीढ़ी का अपना मूल्य है। और सबसे ऊँची सीढ़ी पर पहुँचने पर शांति तुरंत मिलती है — 'अनन्तरम्' यानी उसके ठीक बाद। जैसे जब बच्चा परीक्षा की चिंता छोड़ देता है, तो नींद तुरंत आ जाती है।

यह श्लोक 12.8-12 के अभ्यास-योग सोपान का समापन करता है। पिछले चार श्लोकों में कृष्ण ने चार सीढ़ियाँ दीं — अब 12.12 में वे उन सीढ़ियों की तुलना करते हैं। यह तुलना निषेधात्मक नहीं है — हर मार्ग मान्य है, पर फल-त्याग को सर्वोच्च फल देने वाला बताया है।

परंपरा में यह श्लोक स्वतंत्र रूप से भी बहुत प्रसिद्ध है। इसके बाद 12.13 से भक्त-लक्षण की श्रृंखला शुरू होती है जो 12.19 तक चलती है।

अध्याय 12 · 12 / 20
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