📿 श्लोक संग्रह

अथैतदप्यशक्तोऽसि

गीता 12.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 12 — भक्तियोग
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
अथ
यदि
एतत् अपि
यह भी
अशक्तः असि
समर्थ नहीं हो
कर्तुम्
करने में
मद्योगम्
मेरे योग का
आश्रितः
आश्रय लेकर, शरण में आकर
सर्वकर्मफलत्यागम्
सब कर्मों के फल का त्याग
ततः
तब
कुरु
करो
यतात्मवान्
आत्म-संयमी होकर, मन को वश में रखकर

चौथी और अंतिम सीढ़ी — यदि यह भी न हो सके तो क्या? कृष्ण फिर भी निराश नहीं करते। कहते हैं — मेरे योग का आश्रय लेकर, मन को वश में रखते हुए, अपने सब कर्मों के फल का त्याग कर दो।

फल-त्याग यानी — काम करो, पर उसके नतीजे की चिंता मत करो। किसान बीज बोता है — वर्षा होगी या नहीं, फसल होगी या नहीं, यह उसके हाथ में नहीं। पर वह बोता ज़रूर है। यही फल-त्याग है — कर्म पूरा, चिंता शून्य।

यह अभ्यास-योग सोपान की चौथी और अंतिम सीढ़ी है। 12.8 से 12.11 तक चार सीढ़ियाँ हैं — और कृष्ण ने हर सीढ़ी पर किसी को नहीं छोड़ा। हर स्तर के साधक के लिए एक द्वार खुला रखा है।

परंपरा में 'सर्वकर्मफलत्याग' को गीता की सबसे व्यावहारिक शिक्षा माना जाता रहा है। 12.12 में कृष्ण इन सभी सीढ़ियों की तुलना करते हुए बताएँगे कि इनमें सबसे श्रेष्ठ क्या है।

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