📿 श्लोक संग्रह

मत्कर्मकृन्मत्परमो

गीता 11.55 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
मत्कर्मकृत्
मेरे लिए कर्म करने वाला
मत्परमः मद्भक्तः
मुझे ही परम मानने वाला, मेरा भक्त
सङ्गवर्जितः
आसक्ति से मुक्त
निर्वैरः सर्वभूतेषु
सब प्राणियों के प्रति निर्वैर

कृष्ण अध्याय का समापन इन शब्दों से करते हैं — हे पांडव, जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से मुक्त है और सब प्राणियों के प्रति निर्वैर है — वह मुझे प्राप्त होता है।

यह अध्याय के चार भक्त-लक्षण हैं — मत्कर्म, मत्परम, मद्भक्त, निर्वैर। विश्वरूप दर्शन की यात्रा अंत में इसी सरल, निर्वैर भक्ति पर ठहरती है।

यह अनुष्टुप् छंद का अंतिम श्लोक है। पूरे ग्यारहवें अध्याय की परिणति इस एक श्लोक में है — भव्य विश्वरूप से लेकर सरल भक्ति तक।

अगला अध्याय 12 (भक्तियोग) इसी भक्ति-मार्ग को और गहराई से समझाएगा — वहाँ कृष्ण पूछेंगे, साकार और निराकार में कौन अधिक योगी है?

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