कृष्ण अध्याय का समापन इन शब्दों से करते हैं — हे पांडव, जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से मुक्त है और सब प्राणियों के प्रति निर्वैर है — वह मुझे प्राप्त होता है।
यह अध्याय के चार भक्त-लक्षण हैं — मत्कर्म, मत्परम, मद्भक्त, निर्वैर। विश्वरूप दर्शन की यात्रा अंत में इसी सरल, निर्वैर भक्ति पर ठहरती है।