इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपना विश्वरूप दिखाते हुए कहते हैं — मैं काल हूँ, सबसे बड़ा समय, जो सब कुछ अपने में समेट लेता है। जैसे नदी का पानी अंत में समुद्र में मिल जाता है, वैसे ही सब कुछ काल में समा जाता है।
कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तुम्हारे बिना भी ये योद्धा नहीं बचेंगे, क्योंकि काल ने उनका अंत पहले से तय कर दिया है। यह बात अर्जुन को यह समझाने के लिए कही गई है कि वे केवल निमित्त हैं — असली कर्ता तो काल है।
यह श्लोक विश्वरूप दर्शन के सबसे प्रभावशाली क्षणों में से एक है। अर्जुन ने जो अनंत विराट रूप देखा, उसमें सारी सृष्टि समाती दिखाई दे रही थी।