📿 श्लोक संग्रह

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपः

गीता 11.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
आख्याहि
बताइए
उग्ररूपः
उग्र रूप वाले
देववर प्रसीद
हे देवश्रेष्ठ, प्रसन्न हों
तव प्रवृत्तिम्
आपकी प्रवृत्ति, कार्य

अर्जुन प्रणाम करते हुए पूछते हैं — हे देवश्रेष्ठ, बताइए — आप इस उग्र रूप में कौन हैं? कृपा करें। मैं आपको — इस मूल रूप को — जानना चाहता हूँ। मैं आपकी यह प्रवृत्ति नहीं समझ पा रहा।

यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। अर्जुन जानते हैं यह कृष्ण हैं, लेकिन इस संहार-रूप के पीछे का कारण जानना चाहते हैं। अगले श्लोक (11.32) में कृष्ण उत्तर देंगे — 'मैं काल हूँ।'

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का प्रश्न यहाँ पूरे अध्याय का केंद्र है।

अगले श्लोक 11.32 में कृष्ण का प्रसिद्ध उत्तर है — 'कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्' — मैं काल हूँ, लोकों का संहार करने वाला।

अध्याय 11 · 31 / 55
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