📿 श्लोक संग्रह

भक्त्या त्वनन्यया शक्यः

गीता 11.54 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥
भक्त्या अनन्यया
अनन्य भक्ति से
एवंविधः
इस प्रकार का
ज्ञातुम् द्रष्टुम् तत्त्वेन
जानना, तत्त्वतः देखना
प्रवेष्टुम्
प्रवेश करना

कृष्ण कहते हैं — हे परंतप अर्जुन, केवल अनन्य भक्ति से ही मुझे इस रूप में जाना जा सकता है, देखा जा सकता है और उसमें प्रवेश किया जा सकता है। यही एकमात्र मार्ग है।

यह गीता के भक्तियोग का सार है। ज्ञान, यज्ञ, तप — सब सहायक हैं, पर अनन्य भक्ति ही वह द्वार है जिससे परमात्मा में प्रवेश होता है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। यह पूरे अध्याय 11 का केंद्रीय निष्कर्ष है — विश्वरूप दर्शन की परिणति भक्तियोग में होती है।

अगले और अंतिम श्लोक (11.55) में कृष्ण भक्त के लक्षण बताएंगे — मत्कर्म, मत्परम, मद्भक्त, निर्वैर।

अध्याय 11 · 54 / 55
अध्याय 11 · 54 / 55 अगला →