📿 श्लोक संग्रह

नाहं वेदैर्न तपसा

गीता 11.53 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
न वेदैः न तपसा
न वेदों से, न तप से
न दानेन न इज्यया
न दान से, न यज्ञ से
एवंविधः
इस प्रकार का
दृष्टवान् असि यथा
जैसे तुमने देखा

कृष्ण कहते हैं — न वेदों से, न तप से, न दान से, न यज्ञ से — जैसे तुमने इस रूप में मुझे देखा है, वैसे देखना संभव नहीं है।

यह श्लोक 11.48 का भाव दोहराता है — लेकिन अब इसके बाद सीधे उत्तर आएगा। अगले श्लोक (11.54) में कृष्ण बताएंगे — किससे दिखता है? केवल अनन्य भक्ति से।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। यह श्लोक एक प्रश्न की तरह काम करता है — अगला श्लोक उसका उत्तर है।

अगले श्लोक (11.54) में अध्याय का मूल निष्कर्ष आएगा — अनन्य भक्ति से ही यह दर्शन, ज्ञान और प्रवेश संभव है।

अध्याय 11 · 53 / 55
अध्याय 11 · 53 / 55 अगला →