📿 श्लोक संग्रह

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि

गीता 11.52 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥
सुदुर्दर्शम्
देखने में अत्यंत कठिन
दृष्टवान् असि
तुमने देखा
देवाः अपि
देवता भी
नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः
सदा दर्शन की इच्छा रखते हैं

कृष्ण कहते हैं — मेरा यह रूप जो तुमने देखा, वह देखने में अत्यंत कठिन है। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की कामना करते रहते हैं।

यह कृष्ण का अर्जुन को बताना है कि उन्होंने कोई साधारण दर्शन नहीं किया। देवता भी जिसे तरसते हैं, वह अर्जुन को मिला — यह उनकी भक्ति का फल है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। यह प्रसंग अब भक्तियोग की ओर मुड़ रहा है।

अगले श्लोक (11.53) में कृष्ण पुनः कहेंगे — वेद, तप, दान, यज्ञ — किसी से यह दर्शन नहीं होता।

अध्याय 11 · 52 / 55
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