📿 श्लोक संग्रह

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव

गीता 11.51 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥
मानुषम् रूपम् सौम्यम्
सौम्य मानव रूप
जनार्दन
हे जनार्दन (कृष्ण)
संवृत्तः सचेताः
स्थिर चित्त वाला हो गया
प्रकृतिं गतः
सामान्य अवस्था में लौट आया

अर्जुन राहत से कहते हैं — हे जनार्दन, आपका यह सौम्य मानव रूप देखकर अब मैं स्थिर चित्त का हो गया हूँ और अपनी सामान्य अवस्था में लौट आया हूँ।

यह एक मानवीय क्षण है। अर्जुन विराट दर्शन के बाद जब परिचित कृष्ण को देखते हैं — तो सुकून मिलता है। यही परमात्मा की करुणा है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। विश्वरूप-प्रकरण यहाँ समाप्त होता है। अब कृष्ण भक्तियोग का उपदेश देंगे।

अगले श्लोक (11.52) में कृष्ण कहेंगे — यह मेरा रूप देखना बहुत कठिन है, देवता भी इसे देखने को तरसते हैं।

अध्याय 11 · 51 / 55
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