📿 श्लोक संग्रह

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदम्

गीता 11.47 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥
मया प्रसन्नेन
मेरी प्रसन्नता से
आत्मयोगात्
अपने योगबल से
तेजोमयम् विश्वम् अनन्तम् आद्यम्
तेजमय, विश्वरूप, अनंत, प्रथम
त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्
तुम्हारे सिवा किसी ने नहीं देखा

कृष्ण कहते हैं — हे अर्जुन, मेरी प्रसन्नता से और अपने योगबल से मैंने तुम्हें यह परम रूप दिखाया — तेजमय, विश्वव्यापी, अनंत, आदि। इसे तुम्हारे सिवा पहले किसी ने नहीं देखा था।

यह कृष्ण की विशेष कृपा थी। यह दर्शन अर्जुन की पात्रता का प्रमाण है — भक्त के लिए परमात्मा का ऐसा प्रकटन होता है जो सामान्यतः दुर्लभ है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। कृष्ण यहाँ इस दर्शन की विशिष्टता बताते हैं।

अगले श्लोक (11.48) में कृष्ण कहेंगे — वेद, यज्ञ, दान, क्रिया, तप — किसी से भी यह रूप नहीं देखा जा सकता।

अध्याय 11 · 47 / 55
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