कृष्ण कहते हैं — हे कुरुप्रवीर, न वेदों से, न यज्ञों से, न अध्ययन से, न दान से, न कर्मकांड से, न कठोर तप से — इस रूप में मनुष्यलोक में तुम्हारे सिवा कोई मुझे नहीं देख सकता।
यह श्लोक बड़ी बात कहता है — बाहरी साधनों से परमात्मा का यह साक्षात् दर्शन नहीं होता। यह केवल कृपा और भक्ति से होता है।