📿 श्लोक संग्रह

मा ते व्यथा मा च विमूढभावः

गीता 11.49 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
मा व्यथा मा विमूढभावः
व्यथा मत, घबराहट मत
घोरम् रूपम्
यह भयानक रूप
व्यपेतभीः प्रीतमनाः
भय-मुक्त, प्रसन्नचित्त
तदेव रूपम् प्रपश्य
वही रूप देखो

कृष्ण कोमलता से कहते हैं — मेरा यह भयानक रूप देखकर व्यथित मत हो, घबराओ मत। भय से मुक्त होकर, प्रसन्न मन से — वही मेरा पहले वाला रूप देखो।

यह कृष्ण की करुणा है। वे जानते हैं कि अर्जुन भयभीत हैं। वे स्वयं उन्हें आश्वस्त करते हैं — यही भगवान का भक्त-वत्सल स्वभाव है।

यह अनुष्टुप् छंद का श्लोक है। कृष्ण यहाँ विश्वरूप समेटकर अर्जुन को उनका परिचित रूप लौटाने का संकेत देते हैं।

अगले श्लोक (11.50) में संजय बताएंगे कि कृष्ण ने फिर से अपना सौम्य मानवरूप धारण कर लिया।

अध्याय 11 · 49 / 55
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