📿 श्लोक संग्रह

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम्

गीता 11.46 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥
किरीटिनम् गदिनम् चक्रहस्तम्
किरीट, गदा और चक्र हाथ में लिए
चतुर्भुजेन रूपेण
चार भुजाओं वाले रूप से
सहस्रबाहो
हे हजार भुजाओं वाले
विश्वमूर्ते
हे विश्वमूर्ति

अर्जुन प्रार्थना करते हैं — हे विश्वमूर्ते, हे सहस्रबाहो, मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ — किरीट, गदा और चक्र हाथ में लिए, उसी चतुर्भुज रूप में। उसी रूप में प्रकट हों।

चतुर्भुज विष्णु का परंपरागत स्वरूप है जिसे भक्त जानते हैं। अर्जुन उसी परिचित रूप की शांति माँग रहे हैं।

यह श्लोक अनुष्टुप् (आठ-आठ अक्षर के पाद) में है। विश्वरूप खंड के त्रिष्टुप् छंद के बाद यहाँ फिर अनुष्टुप् आता है।

अगले श्लोक (11.47) में कृष्ण उत्तर देंगे — अर्जुन, मैंने अपने योगबल से यह परम रूप तुम्हें दिखाया।

अध्याय 11 · 46 / 55
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