अर्जुन कहते हैं — हे जगन्निवास, पहले कभी न देखा हुआ यह रूप देखकर मैं प्रसन्न हूँ। लेकिन भय से मेरा मन काँप रहा है। हे देवेश, कृपा करें — मुझे वही पहले वाला रूप दिखाइए।
यह भक्त की स्वाभाविक स्थिति है — विराट परमात्मा को देखकर आनंद और भय दोनों होते हैं। अर्जुन उस परिचित, मित्र-जैसे कृष्ण-रूप में शांति चाहते हैं।