📿 श्लोक संग्रह

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा

गीता 11.45 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
अदृष्टपूर्वम्
पहले न देखा हुआ
हृषितः अस्मि
प्रसन्न हूँ
भयेन प्रव्यथितम्
भय से काँपा हुआ
तदेव रूपम्
वही (पहले वाला) रूप

अर्जुन कहते हैं — हे जगन्निवास, पहले कभी न देखा हुआ यह रूप देखकर मैं प्रसन्न हूँ। लेकिन भय से मेरा मन काँप रहा है। हे देवेश, कृपा करें — मुझे वही पहले वाला रूप दिखाइए।

यह भक्त की स्वाभाविक स्थिति है — विराट परमात्मा को देखकर आनंद और भय दोनों होते हैं। अर्जुन उस परिचित, मित्र-जैसे कृष्ण-रूप में शांति चाहते हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन की यह प्रार्थना अध्याय के महत्वपूर्ण मोड़ पर है।

अगले श्लोक (11.46) में अर्जुन और स्पष्ट कहेंगे — चतुर्भुज रूप में, किरीट-गदा-चक्र के साथ दर्शन दीजिए।

अध्याय 11 · 45 / 55
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