📿 श्लोक संग्रह

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायम्

गीता 11.44 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियो प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥
प्रणिधाय कायम्
शरीर को झुकाकर
ईशम् ईड्यम्
स्तुति के योग्य ईश्वर
पितेव पुत्रस्य
जैसे पिता पुत्र की
प्रियः प्रियायाः
जैसे प्रेमी प्रियजन की

अर्जुन शरीर झुकाकर कहते हैं — हे देव, हे स्तुतियोग्य ईश्वर, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। जैसे पिता पुत्र को, मित्र मित्र को, प्रेमी प्रियजन को क्षमा करता है — वैसे ही आप भी सहन करें।

तीन उपमाएं — पिता-पुत्र, मित्र-मित्र, प्रेमी-प्रिया — यह तीन प्रकार के निकट संबंध हैं। अर्जुन कृष्ण से इन तीनों संबंधों की गर्माहट के साथ क्षमा माँग रहे हैं।

यह त्रिष्टुप् छंद का श्लोक है। अर्जुन का स्तवन अब क्षमा और प्रार्थना में बदल रहा है।

अगले श्लोक (11.45) में अर्जुन कहेंगे — अपूर्व दृश्य देखकर प्रसन्न भी हुआ, पर भय से मन काँपता है — पहले वाला रूप दिखाइए।

अध्याय 11 · 44 / 55
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