📿 श्लोक संग्रह

एवमेतद्यथात्थ त्वम्

गीता 11.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
एवमेतत्
यह सब ऐसा ही है
परमेश्वर
हे परमेश्वर
ते रूपम् ऐश्वरम्
आपका ऐश्वर्य-रूप
पुरुषोत्तम
हे पुरुषोत्तम

अर्जुन कहते हैं — हे परमेश्वर, आपने जो अपने बारे में कहा वह सब सच है। लेकिन मैं अपनी आँखों से आपका वह ईश्वरीय रूप देखना चाहता हूँ। शब्दों में सुना हुआ और आँखों से देखा हुआ अनुभव अलग होता है।

यहाँ 'पुरुषोत्तम' संबोधन से अर्जुन स्वीकार करते हैं कि कृष्ण सबसे परे हैं — साधारण मनुष्यों और देवताओं दोनों से ऊपर।

यह श्लोक अर्जुन की विनम्र जिज्ञासा का प्रतीक है। वे पहले स्वीकार करते हैं कि कृष्ण की बात सत्य है, फिर दर्शन की प्रार्थना करते हैं।

अगले श्लोक में अर्जुन कहेंगे — यदि आप संभव समझें तो मुझे वह अव्यय रूप दिखाइए।

अध्याय 11 · 3 / 55
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