📿 श्लोक संग्रह

मन्यसे यदि तच्छक्यम्

गीता 11.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥
मन्यसे
यदि आप समझते हों
तत् शक्यम्
वह संभव है
योगेश्वर
हे योगेश्वर
आत्मानम् अव्ययम्
अपना अविनाशी रूप

अर्जुन बड़े विनम्र भाव से कहते हैं — हे प्रभु, यदि आप यह उचित समझें कि मैं आपका वह रूप देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना अव्यय रूप दिखाइए। 'यदि संभव हो' — यह विनम्रता की पराकाष्ठा है।

अर्जुन जानते हैं कि वह रूप साधारण नेत्रों से नहीं देखा जा सकता। इसीलिए वे कृष्ण की इच्छा पर छोड़ते हैं। यही भक्त का स्वभाव है — माँगना पर जबरदस्ती नहीं।

अर्जुन यहाँ कृष्ण को 'योगेश्वर' कहते हैं — सब योगों के ईश्वर। अगले ही श्लोक (11.5) में कृष्ण उन्हें 'पाश्य मे पार्थ' कहकर विश्वरूप दिखाना शुरू करेंगे।

यह श्लोक अर्जुन की भक्ति और विनम्रता दोनों का सुंदर उदाहरण है।

अध्याय 11 · 4 / 55
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