📿 श्लोक संग्रह

पश्य मे पार्थ रूपाणि

गीता 11.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
पश्य
देखो
शतशः सहस्रशः
सैकड़ों-हजारों
नानाविधानि
अनेक प्रकार के
नानावर्णाकृतीनि
अनेक रंग-रूप वाले

कृष्ण अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार करते हैं और कहते हैं — हे पार्थ, देखो, मेरे सैकड़ों और हजारों रूप हैं — नाना प्रकार के, दिव्य, अनेक रंगों और आकारों वाले। एक ही परमात्मा में सारी सृष्टि की विविधता समाई हुई है।

जैसे एक ही समुद्र में असंख्य लहरें होती हैं, वैसे ही कृष्ण के एक ही स्वरूप में अनगिनत रूप हैं। यह विश्वरूप दर्शन का निमंत्रण है।

यह श्लोक संजय के माध्यम से हमें सुनाया जा रहा है। कृष्ण यहाँ से विश्वरूप का वर्णन आरंभ करते हैं।

अगले श्लोकों में कृष्ण आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनी कुमार आदि का दर्शन कराने का वचन देंगे।

अध्याय 11 · 5 / 55
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