अर्जुन कहते हैं — हे कमलनयन, मैंने आपसे विस्तार से सुना कि सब प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश कैसे होते हैं, और आपकी अविनाशी महिमा क्या है। यह सुनकर मन और भी जिज्ञासु हो गया।
अर्जुन यहाँ कृष्ण को 'कमलपत्राक्ष' कहते हैं — जिसके नेत्र कमल के पत्तों जैसे विशाल और कोमल हों। यह संबोधन भक्त के प्रेम को दर्शाता है।