📿 श्लोक संग्रह

मदनुग्रहाय परमं

गीता 11.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
मदनुग्रहाय
मुझ पर कृपा के लिए
परमं गुह्यम्
परम गोपनीय
अध्यात्मसञ्ज्ञितम्
अध्यात्म नाम से जाना जाने वाला
मोहः विगतः
मोह दूर हो गया

अर्जुन कहते हैं — हे कृष्ण, आपने मुझ पर कृपा करके जो परम गोपनीय अध्यात्म ज्ञान सुनाया, उसे सुनकर मेरा मोह दूर हो गया। जैसे घने बादल हटने पर सूरज दिखने लगता है, वैसे ही उपदेश से मन का अँधेरा छँट गया।

यह श्लोक अर्जुन की कृतज्ञता का भाव व्यक्त करता है। अध्याय दस में कृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया था। अब अर्जुन उस उपदेश का असर बता रहे हैं।

यह ग्यारहवें अध्याय का पहला श्लोक है। अर्जुन ने दसवें अध्याय में कृष्ण की विभूतियाँ सुनीं और अब आगे उनका विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

यहाँ 'परमं गुह्यम्' से तात्पर्य उस ज्ञान से है जो आत्मा और परमात्मा के संबंध को स्पष्ट करता है।

अध्याय 11 · 1 / 55
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