📿 श्लोक संग्रह

भूय एव महाबाहो

गीता 10.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥
भूयः
फिर एक बार
एव
ही
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
शृणु
सुनो
मे परमं वचः
मेरा परम वचन
यत्
जो
ते
तुम्हें
प्रीयमाणाय
प्रीति रखने वाले को — प्रिय को
वक्ष्यामि
कहूँगा
हितकाम्यया
कल्याण की इच्छा से

कृष्ण यहाँ 'फिर एक बार' कह कर नया अध्याय शुरू करते हैं। नौवें अध्याय में बहुत कुछ बताया जा चुका था। फिर भी कृष्ण रुकते नहीं — क्योंकि वे अर्जुन के कल्याण के लिए बोल रहे हैं, अपने लिए नहीं। यह गुरु का स्वभाव है — शिष्य की समझ पूरी हो तब तक दोहराना।

दो शब्द यहाँ महत्वपूर्ण हैं — 'प्रीयमाणाय' और 'हितकाम्यया'। पहला कहता है कि अर्जुन कृष्ण को प्रिय है। दूसरा कहता है कि कृष्ण उसके हित के लिए बोल रहे हैं। प्रेम और कल्याण — ये दोनों मिलकर ही गीता का आधार हैं।

यह दसवें अध्याय का पहला श्लोक है। नौवें अध्याय में कृष्ण ने राजविद्या और राजगुह्य का वर्णन किया था। अब वे विभूतियोग में अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करने जा रहे हैं।

भगवद्गीता के अनुसार यह ज्ञान तभी फलता है जब गुरु और शिष्य के बीच प्रेम और विश्वास हो — इसीलिए कृष्ण पहले यह संबंध स्थापित करते हैं।

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