कृष्ण यहाँ 'फिर एक बार' कह कर नया अध्याय शुरू करते हैं। नौवें अध्याय में बहुत कुछ बताया जा चुका था। फिर भी कृष्ण रुकते नहीं — क्योंकि वे अर्जुन के कल्याण के लिए बोल रहे हैं, अपने लिए नहीं। यह गुरु का स्वभाव है — शिष्य की समझ पूरी हो तब तक दोहराना।
दो शब्द यहाँ महत्वपूर्ण हैं — 'प्रीयमाणाय' और 'हितकाम्यया'। पहला कहता है कि अर्जुन कृष्ण को प्रिय है। दूसरा कहता है कि कृष्ण उसके हित के लिए बोल रहे हैं। प्रेम और कल्याण — ये दोनों मिलकर ही गीता का आधार हैं।