यह श्लोक विभूतियोग का हृदय है। 'अहं सर्वस्य प्रभवः' — मैं सबका उद्गम हूँ। यह जानना ही भक्ति का आधार है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि जो कुछ है — नदी, पर्वत, प्रकाश, विचार, ऋषि, देवता — सब एक ही मूल से हैं, तो उसका हृदय स्वाभाविक रूप से उस मूल की ओर झुकता है।
'बुधा भावसमन्विताः' — बुद्धिमान, भाव-सहित। गीता में बुद्धि और भाव को अलग नहीं देखा गया। असली ज्ञान वही है जो हृदय तक उतरे। केवल दिमाग में रहे तो वह जानकारी है, जब भाव बनकर भीतर उतर जाए तो वह ज्ञान है।