यह श्लोक एक आश्वासन है। कृष्ण कहते हैं — जो मेरी विभूति और योग को सच में जान लेता है, वह 'अविकम्पेन योगेन' जुड़ता है — बिना डगमगाए, स्थिर योग से। यानी ज्ञान ही योग का आधार है। जहाँ सच्चा ज्ञान है, वहाँ योग स्वाभाविक रूप से आता है।
'तत्त्वतः' — इस एक शब्द में बहुत कुछ है। सतह पर जानना नहीं, भीतर से जानना। जैसे कोई कहे 'मैं जानता हूँ पानी ठंडा होता है' — और कोई कहे 'मैंने जाड़े की रात में नदी में नहाकर जाना है'। दूसरा 'तत्त्वतः' जानना है।