📿 श्लोक संग्रह

मच्चित्ता मद्गतप्राणाः

गीता 10.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
मच्चित्ताः
मुझमें चित्त लगाए हुए
मद्गतप्राणाः
मुझमें प्राण अर्पित किए हुए
बोधयन्तः
एक-दूसरे को जगाते हुए
परस्परम्
आपस में
कथयन्तः
कहते हुए — चर्चा करते हुए
च माम् नित्यम्
और मेरी हमेशा
तुष्यन्ति
तृप्त होते हैं
च रमन्ति च
और आनंदित होते हैं

यह श्लोक भक्तों के जीवन की एक सुंदर तस्वीर है। उनका मन कृष्ण में है, उनके प्राण कृष्ण में हैं। वे आपस में बैठकर कृष्ण की बातें करते हैं, एक-दूसरे को जगाते हैं। और इससे वे तृप्त होते हैं, आनंदित होते हैं। इसमें कोई कठिनाई नहीं — यह सहज जीवन है।

'बोधयन्तः परस्परम्' — एक-दूसरे को जगाते हुए। यह सत्संग का असली अर्थ है। जब दो-तीन लोग मिलकर भगवान की बात करते हैं, तो एक-दूसरे के भीतर की समझ बढ़ती है। गीता यहाँ अकेले की साधना से अधिक, साथ की साधना की बात करती है।

यह श्लोक 10.8 में 'भावसमन्विताः' के विस्तार की तरह है। भाव कैसे जीया जाता है — वह इस श्लोक में दिखता है। चित्त, प्राण, वाणी — सब एक ही दिशा में।

भगवद्गीता के बारहवें अध्याय (भक्तियोग) में भी ऐसे भक्तों का वर्णन है। 10.9 और 12वें अध्याय के श्लोकों को एक साथ पढ़ने से भक्ति का पूरा चित्र बनता है।

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