यह श्लोक भक्तों के जीवन की एक सुंदर तस्वीर है। उनका मन कृष्ण में है, उनके प्राण कृष्ण में हैं। वे आपस में बैठकर कृष्ण की बातें करते हैं, एक-दूसरे को जगाते हैं। और इससे वे तृप्त होते हैं, आनंदित होते हैं। इसमें कोई कठिनाई नहीं — यह सहज जीवन है।
'बोधयन्तः परस्परम्' — एक-दूसरे को जगाते हुए। यह सत्संग का असली अर्थ है। जब दो-तीन लोग मिलकर भगवान की बात करते हैं, तो एक-दूसरे के भीतर की समझ बढ़ती है। गीता यहाँ अकेले की साधना से अधिक, साथ की साधना की बात करती है।