📿 श्लोक संग्रह

न मे विदुः सुरगणाः

गीता 10.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥
नहीं
मे
मेरी
विदुः
जानते
सुरगणाः
देवताओं के समूह
प्रभवम्
उत्पत्ति — मूल
न महर्षयः
न महर्षि भी
अहम् आदिः
मैं ही आदि हूँ — उद्गम हूँ
हि
क्योंकि
देवानाम्
देवताओं का
महर्षीणाम् च
और महर्षियों का भी
सर्वशः
हर प्रकार से

यह श्लोक बड़ी विनम्र स्वीकृति की बात करता है। देवता और महर्षि — जो ज्ञान और शक्ति में सबसे ऊपर माने जाते हैं — वे भी कृष्ण के मूल को नहीं जान सकते। कारण बहुत सीधा है: कृष्ण ही उन सबके आदि हैं। जो सबसे पहले है, उसकी उत्पत्ति कोई नहीं जान सकता।

यहाँ 'सर्वशः' शब्द है — हर प्रकार से। अर्थात् कृष्ण केवल समय में आदि नहीं हैं, बल्कि शक्ति में, ज्ञान में, सत्ता में — हर दिशा से वे मूल हैं। यह अध्याय इसी विस्तार को उदाहरण देकर समझाएगा।

यह दसवें अध्याय का दूसरा श्लोक है। पहले श्लोक में कृष्ण ने कहा — सुनो। इस श्लोक में बताया — क्यों यह ज्ञान खास है। देवता भी यह नहीं जानते।

भगवद्गीता के विभूतियोग में यह स्थापना जरूरी है — जो सबका स्रोत हो, उसकी कोई सीमा नहीं होती। इसीलिए आगे के श्लोकों में उदाहरण दिए जाएंगे, पूर्ण गणना नहीं।

अध्याय 10 · 2 / 42
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