📿 श्लोक संग्रह

अहं सर्वस्य प्रभवः

गीता 10.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
अहम्
मैं
सर्वस्य प्रभवः
सबका उद्गम — मूल
मत्तः
मुझसे
सर्वम् प्रवर्तते
सब प्रवृत्त होता है — निकलता है
इति
ऐसा
मत्वा
जानकर — समझकर
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
बुधाः
बुद्धिमान
भावसमन्विताः
भाव सहित — श्रद्धा सहित

यह श्लोक विभूतियोग का हृदय है। 'अहं सर्वस्य प्रभवः' — मैं सबका उद्गम हूँ। यह जानना ही भक्ति का आधार है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि जो कुछ है — नदी, पर्वत, प्रकाश, विचार, ऋषि, देवता — सब एक ही मूल से हैं, तो उसका हृदय स्वाभाविक रूप से उस मूल की ओर झुकता है।

'बुधा भावसमन्विताः' — बुद्धिमान, भाव-सहित। गीता में बुद्धि और भाव को अलग नहीं देखा गया। असली ज्ञान वही है जो हृदय तक उतरे। केवल दिमाग में रहे तो वह जानकारी है, जब भाव बनकर भीतर उतर जाए तो वह ज्ञान है।

यह श्लोक अनेक वेदांत आचार्यों द्वारा उद्धृत किया गया है। 'प्रभवः' शब्द का अर्थ उद्गम या उत्पत्ति-स्थान है — जहाँ से सब निकलता है। यह गीता का एक केंद्रीय वाक्य है।

भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भी कृष्ण ने कहा था — 'मत्तः परतरं नान्यत्' — मुझसे परे कुछ नहीं। 10.8 उसी कथन का विस्तार है।

अध्याय 10 · 8 / 42
अध्याय 10 · 8 / 42 अगला →