यहाँ सृष्टि का एक सुंदर वर्णन है। सात महर्षि, सनकादि चार और मनु — ये सब कृष्ण के मन से उत्पन्न हुए। 'मानसा जाता' — अर्थात् मन से जन्मे। इन्हीं से फिर सारी प्रजाएँ आईं। यानी परमात्मा ने पहले विचार किया, और उस विचार से सृष्टि बनी।
यह विचार हमारी परंपरा में गहरे जमा है — सृष्टि केवल शरीरों की नहीं, विचारों और भावों की भी है। महर्षियों को 'मद्भाव' कहा गया — वे कृष्ण के भाव को धारण करते थे। इसीलिए उनसे जो प्रजाएँ आईं, वे भी उसी चेतना के अंश हैं।