📿 श्लोक संग्रह

महर्षयः सप्त पूर्वे

गीता 10.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥
महर्षयः सप्त
सात महर्षि
पूर्वे
पहले के — प्राचीन
चत्वारः
चार (सनकादि)
मनवः तथा
और मनु भी
मद्भावाः
मेरे भाव से — मेरे स्वभाव वाले
मानसाः जाताः
मन से उत्पन्न
येषाम्
जिनसे
लोके
संसार में
इमाः प्रजाः
ये प्रजाएँ

यहाँ सृष्टि का एक सुंदर वर्णन है। सात महर्षि, सनकादि चार और मनु — ये सब कृष्ण के मन से उत्पन्न हुए। 'मानसा जाता' — अर्थात् मन से जन्मे। इन्हीं से फिर सारी प्रजाएँ आईं। यानी परमात्मा ने पहले विचार किया, और उस विचार से सृष्टि बनी।

यह विचार हमारी परंपरा में गहरे जमा है — सृष्टि केवल शरीरों की नहीं, विचारों और भावों की भी है। महर्षियों को 'मद्भाव' कहा गया — वे कृष्ण के भाव को धारण करते थे। इसीलिए उनसे जो प्रजाएँ आईं, वे भी उसी चेतना के अंश हैं।

यह श्लोक विभूतियोग की पहली विशिष्ट विभूति-सूची है। 10.4-5 में भाव बताए थे, अब व्यक्तित्वों की बात है। सात महर्षि — भृगु, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ — परंपरागत रूप से इस गणना में माने जाते हैं।

भगवद्गीता में यह श्लोक सृष्टि-विज्ञान की एक झलक है। इसका विस्तार ब्रह्म पुराण और भागवत पुराण में मिलता है।

अध्याय 10 · 6 / 42
अध्याय 10 · 6 / 42 अगला →