📿 श्लोक संग्रह

अहिंसा समता तुष्टिः

गीता 10.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥
अहिंसा
अहिंसा — न हिंसा करना
समता
समभाव
तुष्टिः
संतोष
तपः
तप
दानम्
दान
यशः
यश — कीर्ति
अयशः
अपयश
भवन्ति
होते हैं
भावाः भूतानाम्
प्राणियों के भाव — अवस्थाएँ
मत्तः एव
मुझसे ही
पृथग्विधाः
अनेक प्रकार के

10.4 और 10.5 दोनों श्लोक मिलकर एक बड़ा कथन करते हैं — प्राणियों के जितने भी भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। यहाँ यश और अपयश दोनों एक साथ गिने गए हैं। इसका गहरा अर्थ है — परमात्मा के लिए दोनों समान हैं। वे किसी के यश को बड़ा और किसी के अपयश को छोटा नहीं मानते।

अहिंसा, समता, संतोष, तप — ये वे गुण हैं जिन्हें गीता बार-बार उत्तम बताती है। यहाँ इन्हें भी और उनके विपरीत गुणों को भी एक ही स्रोत से निकला दिखाया गया है। यह बात मन को विस्तृत करती है — संसार में जो भी दिखता है, वह सब उसी एक से है।

यह श्लोक 10.4 का दूसरा भाग है। दोनों मिलकर विभूतियोग की पहली स्थापना करते हैं — परमात्मा सब भावों का मूल है। आगे के श्लोकों में विशिष्ट उदाहरण दिए जाएंगे।

भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में भी दान, तप, यज्ञ की श्रेणियाँ बताई गई हैं — वहाँ के साथ इस श्लोक को पढ़ने पर गीता का पूरा दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।

अध्याय 10 · 5 / 42
अध्याय 10 · 5 / 42 अगला →