10.4 और 10.5 दोनों श्लोक मिलकर एक बड़ा कथन करते हैं — प्राणियों के जितने भी भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। यहाँ यश और अपयश दोनों एक साथ गिने गए हैं। इसका गहरा अर्थ है — परमात्मा के लिए दोनों समान हैं। वे किसी के यश को बड़ा और किसी के अपयश को छोटा नहीं मानते।
अहिंसा, समता, संतोष, तप — ये वे गुण हैं जिन्हें गीता बार-बार उत्तम बताती है। यहाँ इन्हें भी और उनके विपरीत गुणों को भी एक ही स्रोत से निकला दिखाया गया है। यह बात मन को विस्तृत करती है — संसार में जो भी दिखता है, वह सब उसी एक से है।