📿 श्लोक संग्रह

बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः

गीता 10.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥
बुद्धिः
बुद्धि — समझ
ज्ञानम्
ज्ञान
असम्मोहः
मोहरहितता — स्पष्टता
क्षमा
क्षमाशीलता
सत्यम्
सत्य
दमः
इंद्रियों का दमन
शमः
मन की शांति
सुखम्
सुख
दुःखम्
दुःख
भवः अभावः
होना और न होना
भयम् च अभयम्
भय और अभय

यह श्लोक (10.4) और अगला (10.5) मिलकर एक लंबी सूची बनाते हैं। कृष्ण कह रहे हैं — जो भी मनुष्य के मन में होता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा — बुद्धि भी, भय भी, सुख भी, दुःख भी — वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। यह सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन यह सृष्टि की पूर्णता का बयान है।

यहाँ केवल अच्छे गुण नहीं गिने गए — भय, दुःख, अभाव — ये भी सूची में हैं। इसका अर्थ यह है कि परमात्मा केवल शुभ का स्रोत नहीं है — वे सम्पूर्ण अस्तित्व का स्रोत हैं। यह दृष्टि मनुष्य को जीवन की हर परिस्थिति में स्थिर रखती है।

यह श्लोक 10.4-5 के जोड़े का पहला भाग है। दोनों श्लोक मिलकर 20 से अधिक गुण-अवगुण गिनाते हैं जो सब परमात्मा से उत्पन्न हैं। यह विभूतियोग का प्रारंभिक विस्तार है।

भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में भी ऐसी सूची आती है — वहाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संदर्भ में। दोनों मिलकर गीता की समग्र दृष्टि बनाते हैं।

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