📿 श्लोक संग्रह

अथवा बहुनैतेन

गीता 10.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥
अथवा
अथवा — या फिर
बहुना एतेन
इन बहुत बातों से
किम्
क्या काम
ज्ञातेन
जानने से
तव अर्जुन
तुम्हें, अर्जुन
विष्टभ्य
व्याप्त करके — धारण करके
अहम्
मैं
इदम् कृत्स्नम्
यह पूरा — समस्त
एकांशेन
एक अंश से
स्थितः जगत्
जगत में स्थित हूँ

यह दसवें अध्याय का अंतिम श्लोक है — और पूरी गीता के सबसे प्रभावशाली वाक्यों में से एक। कृष्ण कहते हैं — अर्जुन, इन सब बातों को जानने से तुम्हें क्या मिलेगा? बस इतना जान लो — मैं अपने एक अंश से इस पूरे जगत को धारण करके बैठा हूँ। एक अंश में पूरा जगत समाया है।

यह वाक्य मन को विस्मय से भर देता है। पूरी विभूति-सूची — सूर्य, चंद्रमा, महर्षि, नदियाँ, पर्वत, सब — वह केवल एक अंश में है। बाकी अनंत अंश? वे अनकहे हैं, अकल्पनीय हैं। यही विभूतियोग का परम रहस्य है।

यह श्लोक 10.42 पूरे दसवें अध्याय का उपसंहार है। 10.1 में शुरुआत हुई — 'सुनो मेरी बात'। 10.42 में अंत — 'एक अंश से यह सब है।' यह वृत्त पूरा होता है।

भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन इसी का दर्शन करेंगे — विश्वरूप। 10.42 उस दर्शन की तैयारी है। जो बात शब्दों में कही, वह ग्यारहवें में आँखों से दिखेगी।

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