कृष्ण यहाँ ईमानदारी से स्वीकार करते हैं — हे परन्तप, मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं। जो मैंने बताया, वह तो संकेत-मात्र था। यह कहना अपने आप में एक विभूति है — परमात्मा जानते हैं कि उनका पूर्ण वर्णन असंभव है।
यह श्लोक पाठक को एक मुक्ति देता है — गीता की सूची पढ़कर यह मत सोचो कि परमात्मा बस यही हैं। ये उदाहरण हैं, सीमाएँ नहीं। जो भी श्रेष्ठ है, जो भी सुंदर है, जो भी शक्तिशाली है — वह सब परमात्मा की विभूति है।