📿 श्लोक संग्रह

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानाम्

गीता 10.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥
न अन्तः अस्ति
अंत नहीं है
मम दिव्यानाम्
मेरी दिव्य
विभूतीनाम्
विभूतियों का
परन्तप
हे परन्तप — शत्रुओं को तपाने वाले अर्जुन
एषः तु
यह तो
उद्देशतः
संकेत-मात्र से — संक्षेप में
प्रोक्तः
कहा गया
विभूतेः विस्तरः
विभूति का विस्तार
मया
मेरे द्वारा

कृष्ण यहाँ ईमानदारी से स्वीकार करते हैं — हे परन्तप, मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं। जो मैंने बताया, वह तो संकेत-मात्र था। यह कहना अपने आप में एक विभूति है — परमात्मा जानते हैं कि उनका पूर्ण वर्णन असंभव है।

यह श्लोक पाठक को एक मुक्ति देता है — गीता की सूची पढ़कर यह मत सोचो कि परमात्मा बस यही हैं। ये उदाहरण हैं, सीमाएँ नहीं। जो भी श्रेष्ठ है, जो भी सुंदर है, जो भी शक्तिशाली है — वह सब परमात्मा की विभूति है।

यह 10.19 का उत्तर है। वहाँ कृष्ण ने कहा था — 'प्राधान्यतः' — प्रमुख रूप से बताऊँगा। यहाँ 10.40 में वे पुष्टि करते हैं — हाँ, वह सब संक्षेप था, विस्तार अनंत है।

भगवद्गीता में यह विनम्रता महत्वपूर्ण है। परमात्मा स्वयं कहते हैं — मैं अपना पूरा वर्णन नहीं कर सकता। यह अनुभव की विशालता की स्वीकृति है।

अध्याय 10 · 40 / 42
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