यह श्लोक विभूति-सूची का सार है। कृष्ण ने इतने सारे उदाहरण दिए — और अब कहते हैं — जो भी सब प्राणियों का बीज है, वह मैं हूँ। बीज में पूरा वृक्ष छुपा होता है। इसी तरह परमात्मा में पूरी सृष्टि छुपी है।
'न तदस्ति विना यत्स्यान्मया' — ऐसा कुछ भी नहीं है जो मेरे बिना हो सके। यह सबसे व्यापक वाक्य है। चर — जो चलता है। अचर — जो स्थिर है। दोनों में, सब में — परमात्मा हैं। यह कहकर कृष्ण विभूति-सूची का समापन करते हैं।