📿 श्लोक संग्रह

दण्डो दमयतामस्मि

गीता 10.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥
दण्डः
दंड — शासन-दंड
दमयताम् अस्मि
दंड देनेवालों में हूँ
नीतिः अस्मि
नीति हूँ
जिगीषताम्
जीत चाहने वालों में
मौनम् च एव अस्मि
और मौन भी हूँ
गुह्यानाम्
रहस्यों में — गोपनीय चीजों में
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञानवताम् अहम्
ज्ञानियों में मैं

दंड — न्यायपूर्ण शासन। जब राजा दंड देता है, तो वह परमात्मा की विभूति है — क्योंकि वह धर्म की रक्षा करता है। नीति — राजनीति, व्यवहार-नीति। जहाँ जीत के लिए नीति का प्रयोग होता है — वहाँ परमात्मा हैं।

'गुह्यानां मौनम्' — रहस्यों में मौन। यह सबसे गहरी विभूति है इस श्लोक में। जो सबसे बड़ा रहस्य है — वह मौन में है, शब्दों में नहीं। परमात्मा को शब्दों से पूरी तरह नहीं बताया जा सकता — इसीलिए उनकी सबसे गहरी विभूति मौन है।

मौन को विभूति बताना उपनिषदों की 'नेति-नेति' परंपरा से जुड़ता है — परमात्मा को यह भी नहीं, यह भी नहीं कहकर जाना जाता है। जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहाँ परमात्मा की सबसे गहरी उपस्थिति है।

भगवद्गीता के 13वें अध्याय में क्षेत्रज्ञ के लक्षणों में 'ज्ञान' की लंबी सूची है। 10.38 में ज्ञान को ज्ञानियों की विभूति बताकर उस सूची को एक दिव्य आयाम मिलता है।

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