यह श्लोक बहुत अनूठा है। कृष्ण कह रहे हैं — वृष्णियों में मैं वासुदेव हूँ। यानी कृष्ण स्वयं को अपनी विभूति बता रहे हैं! और पांडवों में धनंजय — यानी अर्जुन को भी अपनी विभूति कह रहे हैं। जिससे बात हो रही है, उसे भी परमात्मा का रूप बता रहे हैं — यह गीता का परम क्षण है।
व्यास — जिन्होंने महाभारत लिखा। उशना — शुक्राचार्य, जो असुरों के गुरु और एक महान कवि थे। दोनों को विभूति बताकर गीता कहती है — ज्ञान और काव्य-शक्ति कहीं से भी आए, वह परमात्मा की शक्ति है।