📿 श्लोक संग्रह

द्यूतं छलयतामस्मि

गीता 10.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥
द्यूतम्
जुआ — द्यूत
छलयताम् अस्मि
छलनेवालों में हूँ
तेजः
तेज — दीप्ति
तेजस्विनाम् अहम्
तेजस्वियों में मैं
जयः अस्मि
विजय हूँ
व्यवसायः अस्मि
उद्यम हूँ — दृढ़ संकल्प हूँ
सत्त्वम्
सत्त्व
सत्त्ववताम् अहम्
सात्त्विकों में मैं

यह श्लोक चौंकाता है — 'द्यूतं छलयताम्' — छलनेवालों में मैं जुआ हूँ। यह बात तब समझ में आती है जब हम गीता की व्यापक दृष्टि देखते हैं। परमात्मा सब वर्गों में सबसे प्रमुख हैं — चाहे वह वर्ग शुभ हो या अशुभ। यह सर्वव्यापकता का बयान है, जुए की प्रशंसा नहीं।

विजय, उद्यम और सत्त्व — ये तीन सकारात्मक विभूतियाँ हैं। जीत में परमात्मा हैं — इसीलिए जब कोई अच्छे काम में जीतता है, वह उत्सव परमात्मा का उत्सव है। उद्यम — दृढ़ संकल्प और परिश्रम — वह भी परमात्मा की शक्ति है।

जुए का उल्लेख महाभारत में बहुत महत्वपूर्ण है — युधिष्ठिर का द्यूत-क्रीड़ा महाभारत की त्रासदी का केंद्र है। यहाँ 10.36 में उसे विभूति बताना एक दार्शनिक वक्तव्य है — परमात्मा हर जगह हैं, यहाँ तक कि जहाँ हम उन्हें देखना न चाहें।

भगवद्गीता के 17वें और 18वें अध्याय में सत्त्व, रजस्, तमस् का विस्तार से वर्णन है। 10.36 में 'सत्त्ववताम् अहम्' — सात्त्विकों में मैं हूँ — वही परंपरा का संकेत है।

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