📿 श्लोक संग्रह

बृहत्साम तथा साम्नाम्

गीता 10.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥
बृहत्साम
बृहत्साम — सामगान में श्रेष्ठ
तथा साम्नाम्
और सामों में
गायत्री
गायत्री छंद
छन्दसाम् अहम्
छंदों में मैं
मासानाम्
महीनों में
मार्गशीर्षः अहम्
मैं मार्गशीर्ष हूँ
ऋतूनाम्
ऋतुओं में
कुसुमाकरः
फूलों का लाने वाला — वसंत

बृहत्साम सामवेद का एक प्रमुख गान है जो उषाकाल में गाया जाता है। गायत्री — वह छंद जिसमें ऋग्वेद का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। छंदों में गायत्री सबसे पुरानी और सबसे पवित्र मानी जाती है।

मार्गशीर्ष — अगहन मास। परंपरा में यह मास सबसे शुभ माना जाता है — इसमें खेत पकते हैं, हवा ठंडी होती है। और वसंत — 'कुसुमाकर' — फूलों का लाने वाला। जब पेड़ फूलते हैं, जब प्रकृति सबसे सुंदर होती है — वह परमात्मा की विभूति है।

गायत्री छंद में गायत्री मंत्र है जो ऋग्वेद (3.62.10) में है। इसे वेद का सार माना जाता है। यहाँ 10.35 में गायत्री को छंदों में श्रेष्ठ कहा गया है — यह गीता की वेद-परंपरा के प्रति श्रद्धा है।

मार्गशीर्ष को श्रेष्ठ महीना बताना — यह एक ऐतिहासिक संकेत भी हो सकता है। प्राचीन काल में वर्ष का आरंभ अगहन से माना जाता था। गीता यहाँ उस प्राचीन परंपरा को स्वीकार करती है।

अध्याय 10 · 35 / 42
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