📿 श्लोक संग्रह

मृत्युः सर्वहरश्चाहम्

गीता 10.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
मृत्युः सर्वहरः च अहम्
सब हर लेने वाली मृत्यु भी मैं
उद्भवः च
और उत्पत्ति भी
भविष्यताम्
आने वाले की — जो होने वाला है उसकी
कीर्तिः
कीर्ति — यश
श्रीः
श्री — समृद्धि, लक्ष्मी
वाक् च
और वाणी
नारीणाम्
स्त्रियों में
स्मृतिः
स्मृति — स्मरण-शक्ति
मेधा
मेधा — प्रतिभा
धृतिः
धृति — धैर्य
क्षमा
क्षमा

मृत्यु को भी परमात्मा की विभूति कहा गया है — 'सर्वहर' — जो सब कुछ हर लेती है। और साथ ही 'उद्भव' — नए की उत्पत्ति भी। मृत्यु और जन्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं — दोनों में परमात्मा हैं। यह भाव मन को मृत्यु-भय से मुक्त करता है।

फिर सात स्त्री-गुण गिनाए गए — कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति, क्षमा। ये सब स्त्रीलिंग शब्द हैं और इन्हें 'नारीणाम्' कहा गया है। ये गुण जहाँ भी प्रकट हों — पुरुष में हों या स्त्री में — वे परमात्मा की विभूतियाँ हैं।

श्री — लक्ष्मी — को यहाँ विभूति के रूप में गिना गया है। श्री-सूक्त और लक्ष्मी-संबंधी परंपराएँ वेदों और पुराणों दोनों में हैं। यहाँ उन्हें परमात्मा की विभूति बताना उनकी दिव्यता की स्वीकृति है।

भगवद्गीता में स्त्री-गुणों की यह सूची अनूठी है। ज्ञान, स्मृति, धैर्य, क्षमा — ये वे गुण हैं जिन्हें गीता बार-बार श्रेष्ठ बताती है, और यहाँ ये सब परमात्मा के रूप हैं।

अध्याय 10 · 34 / 42
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