📿 श्लोक संग्रह

अक्षराणामकारोऽस्मि

गीता 10.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥
अक्षराणाम्
अक्षरों में
अकारः अस्मि
'अ' हूँ
द्वन्द्वः
द्वंद्व समास
सामासिकस्य च
और समासों में
अहम् एव
मैं ही
अक्षयः कालः
अक्षय काल — अनंत समय
धाता अहम्
मैं विधाता हूँ
विश्वतोमुखः
सब ओर मुख वाला

संस्कृत में 'अ' पहला अक्षर है — सब वर्णों का आधार। बिना 'अ' के कोई भी अक्षर बोला नहीं जा सकता। इसीलिए कृष्ण कहते हैं — अक्षरों में मैं 'अ' हूँ। वह मूल ध्वनि हूँ जिससे सब भाषाएँ बनती हैं। द्वंद्व समास — जैसे 'राम-लक्ष्मण' — जहाँ दोनों बराबर हैं, वह समासों में सबसे स्वाभाविक है।

'अक्षयः कालः' — अक्षय काल। समय नष्ट नहीं होता, वह सदा बना रहता है। और 'विश्वतोमुखः' — सब ओर मुख वाला। परमात्मा किसी एक दिशा की ओर नहीं देखते — वे सब ओर हैं। जो भी किसी भी दिशा में देखता है, वह परमात्मा को देख रहा है।

'अकार' का महत्व उपनिषदों में भी है। माण्डूक्योपनिषद में ओंकार के तीन मात्राओं में 'अ' को जागृत अवस्था से जोड़ा गया है। यहाँ गीता में उसे सब अक्षरों में श्रेष्ठ कहा गया है।

भगवद्गीता में काल को 11.32 में 'लोकक्षयकृत' भी कहा गया है — काल जो संसार को नष्ट करता है। 10.33 में वही काल 'अक्षय' है — यह काल के दो रूप हैं जो एक ही तत्व के हैं।

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