यह श्लोक 10.20 की याद दिलाता है जहाँ कृष्ण ने कहा था — मैं सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ। यहाँ वही बात सृष्टियों के संदर्भ में कही गई है। हर रचना — चाहे वह सृष्टि हो, विचार हो, या ग्रंथ — उसका आदि, मध्य और अंत परमात्मा में है।
विद्याओं में अध्यात्म-विद्या — स्वयं को जानने की विद्या — सबसे श्रेष्ठ है। और वाद — जिसमें सत्य की खोज हो, न केवल जीतने की इच्छा। जहाँ तर्क सत्य की ओर ले जाए, वहाँ परमात्मा हैं।