संस्कृत में 'अ' पहला अक्षर है — सब वर्णों का आधार। बिना 'अ' के कोई भी अक्षर बोला नहीं जा सकता। इसीलिए कृष्ण कहते हैं — अक्षरों में मैं 'अ' हूँ। वह मूल ध्वनि हूँ जिससे सब भाषाएँ बनती हैं। द्वंद्व समास — जैसे 'राम-लक्ष्मण' — जहाँ दोनों बराबर हैं, वह समासों में सबसे स्वाभाविक है।
'अक्षयः कालः' — अक्षय काल। समय नष्ट नहीं होता, वह सदा बना रहता है। और 'विश्वतोमुखः' — सब ओर मुख वाला। परमात्मा किसी एक दिशा की ओर नहीं देखते — वे सब ओर हैं। जो भी किसी भी दिशा में देखता है, वह परमात्मा को देख रहा है।