📿 श्लोक संग्रह

पवनः पवतामस्मि

गीता 10.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥
पवनः
वायु
पवताम् अस्मि
पवित्र करने वालों में हूँ
रामः
राम
शस्त्रभृताम् अहम्
शस्त्रधारियों में मैं
झषाणाम्
मछलियों में
मकरः च अस्मि
मकर — घड़ियाल हूँ
स्रोतसाम् अस्मि
नदियों में हूँ
जाह्नवी
जाह्नवी — गंगा

पवन — वायु — जो पवित्र करती है, जो प्राण देती है। 'पवताम्' — पवित्र करने वालों में। राम — अस्त्रधारियों में। यहाँ राम का अर्थ परशुराम या वाल्मीकि रामायण के राम — परंपरागत रूप से दोनों संभव हैं। दोनों ही अपने वर्ग में सर्वश्रेष्ठ हैं।

मकर — मगरमच्छ या घड़ियाल — जलचरों में सबसे शक्तिशाली। और नदियों में गंगा। गंगा केवल नदी नहीं — वे माँ हैं, पापनाशिनी हैं, पुराणों में जीवनदायिनी कही गई हैं। उन्हें कृष्ण की विभूति कहना उनकी पवित्रता को स्वीकार करना है।

गंगा का उल्लेख भागवत पुराण, महाभारत और अनेक पुराणों में है। उनकी उत्पत्ति की कथा वाल्मीकि रामायण के बालकांड में भी आती है — भगीरथ की तपस्या से उनका पृथ्वी पर आगमन।

राम का उल्लेख गीता में यहाँ एकमात्र बार है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम धर्म के मूर्त स्वरूप हैं — इसीलिए शस्त्रधारियों में उन्हें परमात्मा की विभूति कहा गया।

अध्याय 10 · 31 / 42
अध्याय 10 · 31 / 42 अगला →