📿 श्लोक संग्रह

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम्

गीता 10.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥
प्रह्लादः च अस्मि
प्रह्लाद हूँ
दैत्यानाम्
दैत्यों में
कालः
काल — समय
कलयताम् अहम्
गणना करने वालों में मैं
मृगाणाम् च
और पशुओं में
मृगेन्द्रः अहम्
मैं सिंह हूँ
वैनतेयः च
और विनता-पुत्र गरुड
पक्षिणाम्
पक्षियों में

प्रह्लाद — हिरण्यकशिपु का पुत्र, जो दैत्य कुल में जन्मा लेकिन विष्णु का परम भक्त था। कृष्ण कहते हैं — दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ। यानी दुर्जन कुल में भी जो श्रेष्ठता और भक्ति प्रकट होती है, वह परमात्मा की विभूति है।

काल — समय, जो सब कुछ गिनता है और सब कुछ बदलता है। सिंह — पशुओं का राजा। गरुड — विष्णु का वाहन, पक्षियों में सबसे शक्तिशाली। इन सबमें एक बात समान है — वे अपने वर्ग में सबसे प्रबल हैं। उस प्रबलता में परमात्मा दिखते हैं।

प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण के सातवें स्कंध में विस्तार से है। उनकी भक्ति और उन पर हुए अत्याचार, फिर भगवान का प्रकट होना — यह कथा भक्ति की सबसे प्रेरक कहानियों में से एक है।

गरुड को विष्णु-पुराण में विष्णु का वाहन और परम भक्त बताया गया है। यहाँ 10.30 में उन्हें विभूति बताना उनकी उस स्थिति की स्वीकृति है।

अध्याय 10 · 30 / 42
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