📿 श्लोक संग्रह

आयुधानामहं वज्रम्

गीता 10.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥
आयुधानाम् अहम्
अस्त्रों में मैं
वज्रम्
वज्र
धेनूनाम् अस्मि
गायों में हूँ
कामधुक्
कामधेनु — मनोकामना पूर्ण करने वाली गाय
प्रजनः च अस्मि
प्रजनन में हूँ
कन्दर्पः
कंदर्प — कामदेव
सर्पाणाम् अस्मि
सर्पों में हूँ
वासुकिः
वासुकि

वज्र — इंद्र का अस्त्र, दधीचि ऋषि की हड्डियों से बना। यह सबसे शक्तिशाली अस्त्र माना गया है। कामधेनु — वह दिव्य गाय जो सब मनोकामनाएँ पूर्ण करती है। इन दोनों में — शक्ति और करुणा — दोनों रूपों में परमात्मा हैं।

कंदर्प — कामदेव। यहाँ कृष्ण कहते हैं — प्रजनन में मैं कंदर्प हूँ। यह सृजन की शक्ति है — जो नई पीढ़ी को लाती है। गीता इसे भी परमात्मा की विभूति मानती है। सृष्टि का हर रूप — विनाश भी, सृजन भी — उसी एक से है।

वज्र की कथा ऋग्वेद और भागवत पुराण दोनों में है। दधीचि ने अपनी हड्डियाँ देकर इंद्र को वज्र बनाने दिया — यह त्याग की सबसे बड़ी कथाओं में एक है।

भगवद्गीता में सृष्टि के हर पहलू को परमात्मा से जोड़ा गया है। कामदेव को विभूति बताना यह दर्शाता है कि गीता जीवन के किसी भी पहलू को अशुभ नहीं मानती — हर चीज परमात्मा की अभिव्यक्ति है।

अध्याय 10 · 28 / 42
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