📿 श्लोक संग्रह

उच्चैःश्रवसमश्वानाम्

गीता 10.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 10 — विभूतियोग
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥
उच्चैःश्रवसम्
उच्चैःश्रवा को
अश्वानाम्
घोड़ों में
विद्धि माम्
मुझे जानो
अमृतोद्भवम्
अमृत से उत्पन्न
ऐरावतम्
ऐरावत को
गजेन्द्राणाम्
हाथियों के राजाओं में
नराणाम् च
और मनुष्यों में
नराधिपम्
राजा को — नरों का अधिपति

उच्चैःश्रवा — समुद्र-मंथन से निकला दिव्य सफेद घोड़ा। 'अमृतोद्भवम्' — अमृत के साथ उत्पन्न हुआ। यह विशेषण उसे साधारण घोड़ों से अलग करता है। ऐरावत — इंद्र का सफेद हाथी, जो चार दाँत वाला और बादलों को उठाने वाला माना जाता है।

मनुष्यों में राजा। राजा वह है जो पूरी प्रजा का पोषण करता है, उसकी रक्षा करता है। उत्तम राजा में वे सब गुण होते हैं जो परमात्मा में होते हैं — न्याय, करुणा, शक्ति। इसीलिए मनुष्यों की विभूति राजा है।

समुद्र-मंथन की कथा भागवत पुराण और विष्णु पुराण में विस्तार से आती है। उच्चैःश्रवा और ऐरावत दोनों उसी मंथन से निकले थे — इसीलिए वे दिव्य माने जाते हैं।

भगवद्गीता में राजधर्म का कोई अलग अध्याय नहीं है, लेकिन जहाँ-जहाँ राजा का उल्लेख है, वहाँ श्रेष्ठ शासन का भाव है — 10.27 उसी भाव की एक झलक है।

अध्याय 10 · 27 / 42
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